हरीश चन्द्र का एक छोटा सा परिचय
तान्त्रिक हरीश चन्द्र. उतर प्रदेश के गोरखपुर जिलें के खजनी क्षेत्र के अन्तर्गत ग्राम गहना में श्री भरत प्रसाद के पुत्र, श्री मिठाई लाल के प्रथम पुत्र का जन्म 20 जून 1976 कों हुआ। इनकें पिता श्री मिठाई लाल दिल्ली में एक फैक्टी में एक मशीन मैन के रुप में कार्यरत थे। सन् 1982 में उन्होने अपनें पुत्र व पत्नी को अपने पास दिल्ली बुला लिया अपनें पिता के प्रथम पुत्र होने के कारण 1983 में मा विन्ध्यवासिनी (मिर्जापुर)देवी की कृपा हुई और पहली बार देवी की छाया प्रतीत हुई जिसकें कारण 3 दिन लगातार बेहोशी की स्थिति बनी रही दिल्ली के ही करनाल रोड़ पर मुखमेल पुर गांव में श्री चतर सिंह भगत जी के आर्शीवाद से स्थिति सामान्य हुई और चतर सिंह भगत जी के पास आना जाना शुरु हुआ देवी की कृपा होने के कारण चतर सिंह ने इस बालक को सन् 1986 में अपना शिष्य स्वीकार किया और अपनें साथ पूजा पाठ व साधनाओं में ले जाकर ज्ञान देते रहें व साधनाएं भी करातें रहे। सन् 1992 में चतर सिंह ने पूर्ण ज्ञान दिया और स्वयं की गद्दी लगानें की अनुमति दी चतर सिंह भगत जी के साथ मिल कर दिल्ली व दिल्ली से बाहर जाकर लोगों का भला व पूजा पाठ करतें रहे परन्तु तन्त्र की खोज में नियंत्रण लगे रहें ।
5 मई 1998 को हरीश चन्द्र का विवाह हुआ और भक्ति के साथ साथ अपना गृहस्त जिवन प्रारम्भ कर दिया परन्तु शक्ति और तन्त्र की तलाश मे निरन्तर प्रयास जारी रहा !
एक बुजुर्ग के मुख से सुना की तन्त्र की पीठ का मुख्य स्थान असम में कामाख्या देवी का स्थान मुख्य माना जाता है। सन् 2004 में तन्त्र पीठ कामाख्या देवी जाने का योजना बनाया और 15 जून 2004 को कामाख्या मन्दिर पहुचनें पर पता चला की 21 जून से 25 जून तक अम्बूवाची मेला लगेगा जिसमें हजारों तान्त्रिक अपनी सिद्धी करतें है यह दृश्य देखनें की लालसा जागी और वास्तव में हजारों की तादात में भक्त व तान्त्रिक वहा उपस्थित हुए 2004 से 2012 तक गुरु की तलाश में भटकतें रहें सन् 2013 में कामाख्या मन्दिर के पुजारी व तन्त्र गुरु श्री मानस भट्टाचर्जी से दिक्षा प्राप्त कर तन्त्र की ओर कदम रखा तन्त्र गुप्त पूजा क्यों है। और इसे हमेशा गोपनीय ही क्यों रखा जाता है। ये जानकारी 2013 में जब श्री गुरु मानस भट्टाचर्जी जी से दिक्षा ली तब पता चला।
दिक्षा के बाद से मां काली को ईष्ट मान कर अपने गुरु जी के साथ व बडे गुरु भाई श्री एस.के. पण्डेय व श्री अशोक माने जी के साथ कई साधनाए और हवन पुजा पाठ निरन्तर करते रहे। साधनाए व अनेक सिद्धीया हासिल करने मे श्री एस.के. पण्डेय व श्री अशोक माने जी की अहम भूमिका रही। अपनें गुरु से मिलनें व ज्ञान की प्राप्ती के लिए दिल्ली से कामाख्या धाम आना जाना लगा रहा रहता है अम्बुवाची मेला, गुप्त नवरात्री, व अन्य त्यौहारों पर जाकर मा कामाख्या के चरणों में साधनाएं व जाप सिद्धी निरन्तर चलता रहता है। कभी कभी ऐसा भी होता हैं की कीसी कीसी की पूजा मा कामाख्या जी के धाम पर तन्त्र विधि द्वारा की जाती हैं। जो की बहुत फलदायी होती है।