माँ धूमावती
दशमहाविद्या रुपों के अंतर्गत “माता धूमावती” युगों युगों तक परम प्रेम की विरह वेदना,त्याग और ममता से भरी भूखी माँ है।किस चीज की भूख है इन्हें?वास्तव में जीव को शिव तत्व से ज्ञान प्राप्त कराकर शिव में मिला देना और सभी कुछ प्रदान कर देना यही इनकी ममतामयी भूख हैं।भूखी माँ हैं इसलिए भक्त को अपने आचार के हिसाब से धूमावती माता को खूब ढेर सारा भोग देना चाहिये ताकि माँ की कृपा बनी रहे। इनकी साधना बिना योग्य गुरू के कभी भूल से भी नही करनी चाहिये।मोह का जो नाश कर दे वही धूमावती हैं।हमारे जीवन में भाँति भाँति के मोह हैं।प्रेमिका,पत्नि का मोह,पद प्रतिष्ठा का मोह,संतान,धन,पद का मोह यहाँ तक की अपने शरीर का मोह,अंहकार का मोह,पापकर्म का मोह।जीवन के हर क्षेत्र में हम मोह से ग्रसित है,कारण हमारे अंदर दैविक शक्ति के साथ आसुरी शक्ति भी विद्यमान है इस आसुरी शक्ति के मोह का यह नाश करती है तभी हम अध्यात्म के डगर पर श्रद्धा से निर्भिक होकर पैर बढा पाते है।शत्रु संहार और दारिद्रय नाश के साथ ही भक्तों की रक्षा करती हैं।
इनकी उत्पति की कथा कुछ इस प्रकार है।एक बार भगवान शिव के अंक में अवस्थित माँ पार्वती भूख से पिड़ित होकर शिव से कुछ भोजन प्रबंध करने को कहने लगी,तब शिव ने कहा देवी प्रतिक्षा किजिये,शीघ्र भोजन की व्यवस्था होगी।परन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी भोजन की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी तब स्वयं भगवती ने शिव को ही मुख में रखकर निगल लिया,उससे उनके शरीर से धुआं निकला और शिव जी अपने माया से बाहर आ गये। बाहर आकर शिव ने पार्वती से कहा,मैं एक पुरूष हूँ और तुम एक स्त्री हो,तुमने अपने पति को निगल लिया।अतः अब तुम विधवा हो गई हो इस कारण तुम सौभाग्यवती के श्रृंगार को छोड़कर वैधव्यवेष में रहो।तुम्हारा यह शरीर परा भगवती बगलामुखी पीताम्बरा के रूप में विद्यमान था,लेकिन अब तुम धूमावती महाविद्या के रूप में जगत में पूजित होकर संसार का कल्याण करते हुए विख्यात होगी।
रुप और नामः-
यह देवी भयानक आकृति वाली होती हुई भी अपने भक्तों के लिये सदा तत्पर रहती हैं।इन्हें ज्येष्ठा तथा अलक्ष्मी भी कहा जाता हैं।जगत की अमांगल्यपूर्ण अवस्था की अधिष्ठात्री के रूप में ये देवी त्रिवर्णा,विरलदंता,चंचलाविधवा,मुक्तकेशी,शूर्पहस्ता,कलहप्रिया,काकध्वजिनी आदि विशेषणों से वर्णित हैं।
प्रसंगः-
दतिया में माता धूमावती की प्रतिष्ठा हुई,कारण सन १९६२ ई. में चीन देश द्वारा अपने देश पर आक्रमण करने से देश में संकट की घड़ी पैदा हो गयी।देश की आजादी शैशवास्था में थी।वहाँ के नेता माओत्सेतुङ्ग और चाऊएनलाई ने भारत से मित्रता कर हमें धोखा दिया था़।सच्चे देशभक्त की भाँति “श्रीस्वामी प्रभु” का हृदय राष्ट्र पर आई विपति को देखकर द्रवित हो उठा।
प्रभु ने राष्ट्र को निर्लिप्त रखकर उस महानतम विपत्ति से किस प्रकार बचाया जाये,इसका स्मरण करते हुये माँ का गुणगान किया।श्रीस्वामी जी ने एक शास्त्री को बुलाकर कहा कि देश पर संकट हैं और यह दैवीय उपाय से ही टाला जा सकता हैं।बड़े बलिदानों के बाद हमारा देश स्वतंत्र हुआ हैं,परन्तु शत्रु आक्रमण करके देश को फिर से गुलाम बनाना चाहते हैं।इन शत्रुओं की बर्बरता हमारे आर्य धर्म के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध होगी। देश में न राम रहेगा न दास। देश में नास्तिकता घर कर जाएगी। शास्त्री ने जिज्ञासा की,क्या इसका कोई उपाय किया जा सकता है?प्रभो! श्री स्वामी जी ने उत्तर दिया,साधु शस्त्र लेकर तो लड़ नहीं सकते,पर जगदम्बा का प्रार्थना रूप अनुष्ठान अवश्य करा सकते हैं। इसके लिए सौ कर्मकाण्डी पण्डितों की आवश्यकता होगी,जो नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हो अपने दैनिक जीवन में। जो अपने भजन का विक्रय न करते हों,जो शक्ति मन्त्र से दीक्षित हो। इसके लिए धन भी चाहिए।फिर चीन तो क्या ब्रह्माण्ड भी बदला जा सकता है। तुम कार्यक्रम की तैयारी करो। शास्त्री ने घर आकर विचार किया कि इसमें तो लाखों रूपये खर्च होंगे,धन कहाँ से आएगा? दूसरे दिन श्री महराज ने पूछा”क्या कार्यक्रम बना लिया हैं”?नहीं महराज जी अभी बना रहा हूँ। कहकर बात टाल दी। 
श्रीस्वामी जी ने कहा शीघ्रता से बनाओ।तीसरे दिन भक्त रामदास बाबा ने देखा महाराज जी व्यग्रता और बैचेनी से शिव मन्दिर के पास टहल रहे हैं। डरते डरते पास जाकर उन्होंने देखा कि महाराज जी का शरीर काँप रहा है नेत्रों में लाली छायी हैं,और मुँह से सिंह जैसी गर्जना निकल रही हैं। उन्होंने देखा कि श्री महाराज जी ने दाहिने हाथ की मुट्ठी को बाँधकर अपने सीने पर बड़े जोर से मारा जिससे बड़े धमाके की आवाज हुई। फिर सिंह गर्जनाकर बोले चीन अवश्य वापस जाएगा,चाहे मुझे इसके लिए अपना सर्वस्व ही क्यों न लगाना पड़े।इस देश का अन्न खाया हैं।रामदास बाबा से कहकर उस शास्त्री को बुलवा कर पूछा क्या तुमने कार्यक्रम बना लिया हैं? शास्त्री ने कहा महाराज बना रहा हूँ। यह सुनते ही महाराज जी ने कहा “तुम बड़े सुस्त हो,देश पर संकट आया है और तुम काम में देर कर रहे हो।”शास्त्री मन ही मन सोच रहे थे,चलो कार्यक्रम तो बना देते हैं होना जाना तो कुछ है नहीं क्योंकि खर्च का प्रबन्ध कहाँ से होगा। अभी यह बात सोच ही रहे थे कि देखा दवाईयाँ बनाने वाली कम्पनी “बैधनाथ भवन के मालिक पण्डित रामनारायण वैध” स्वामी दर्शन हेतु बड़ी व्यग्रता से अन्दर आ रहे हैं। वैध जी ने आते ही प्रणाम करके कहा प्रभो देश पर महान संकट आया है,क्या किया जाए? श्री स्वामी जी ने उत्तर दिया “उपाय तो है लेकिन धन की आवश्यकता पड़ेगी।” वैधजी ने शीघ्र उत्तर दिया मेरी अपनी सम्पूर्ण सम्पति जो आपकी कृपा से ही मुझे प्राप्त हुई है,राष्ट को समर्पित हैं। यह सुनकर शास्त्री सोचने लगे मुझे कितने दिन प्रभु के पास आते हुए हो गये लेकिन मैंने इन्हें पहचाना नहीं और बात को टालता रहा,वे लज्जित होकर शीघ्र ही कार्यक्रम बनाने में जुट गए। वैद्यजी ने धन और पण्डित सबका प्रबन्ध किया,अनुष्ठान प्रारम्भ हो गया। अनुष्ठान के मध्य में ही श्री सदाशिव स्वामी अनुष्ठान की सफलता की घोषणा कर दी। इस अनुष्ठान में त्रैलोक्य स्तम्भिनी भगवती बगलामुखी एवं भगवती धूमावती का आह्वान किया गया था। अनुष्ठान के दौरान जबकि अनुष्ठान प्रारंभ हुए करीब एक सप्ताह हुआ था श्री प्रभु ने अपने रात्री के एक स्वप्न का साधकजनों को विस्तृत विवरण दिया “रात्री को हमने स्वप्न में क्या देखा कि हम घूमते हुए उद्यान में पहुँचे जहाँ एक छोटा सा जलाशय भी है। समीप जाकर क्या देखते हैं,जलाशय के किनारे एक काले वर्ण की बुढिया बैठी है और उसके पास एक बालक भी खड़ा है। पास आने पर बुढिया अंग्रेजी में बोली “आई डोन्ट नो यू”।यह वचन सुनकर मैंने हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया,इतने में हमारी नींद टूट गई तब से हम यही सोच रहे हैं कि यह तो धूमावती देवी थी। हम हमेशा इनका स्मरण भी करते हैं फिर भी इन्होने यह क्यों कहा “आई डोन्ट नो यू” श्री महाराज के श्री मुख से यह शब्द बड़े ही प्यारे मालुम हुए। श्री स्वामी ने आगे कहा “मालुम होता है कि इस अनुष्ठान में हमने इनका योगदान नहीं लिया है शायद वे इसलिए असंतुष्ट हैं,हमें उनका भी योगदान इस अनुष्ठान में लेना होगा। फिर वैसा ही किया गया। भक्त गोपालदास जो वहाँ बैठे थे,श्री महाराज जी से आज्ञा माँगकर भगवती धूमावती के संस्मरण सुनाने लगे जो अनुष्ठान के समय में हुए थे।श्री प्रभु ने उनको आदेश दिया था कि भगवती धूमावती के चित्र से,जो दीपक के सामने स्थित है,यदि कोई अनुभव या मूक भाषा सुनाई दे तो वह तुरन्त आपको सुनाया जाए। ग्यारहवें दिन अर्धरात्री को आश्रम में निर्मित अखाड़े के पास एक भयानक तांत्रिक पशु की ध्वनि हुई। तुरन्त जाकर भक्तों द्वारा स्वामी जी को बताया गया और उन्होनें प्रसन्न मुद्रा में कहा आंरभ शुभ है जाओ अपना काम करो।पन्द्रहवें दिन चित्र से आदेश मिला मैं भूखी हूँ। यह भी प्रभु को बतलाया,तो उन्होनें पूरा विवरण सुनकर कहा,वह तो हमेशा भूखी रहती हैं,उनको बली देना अत्यन्त कठिन है।चावल,साबुत,उड़द,शुद्ध घी,गुड़ और दही सम्मिश्रण कर भोजन कराओ”।दूसरे दिन पुनःचित्र से संकेत मिला कि “भोजन पर्याप्त नहीं है,तब फिर श्री स्वामी की आज्ञा से घी चुपड़ी चार रोटी और बढा दी गई। अगली रात पुनः चित्र से संकेत मिला कि अभी जप कम हो रहा है,पाँच माला और बढाओ,तब उन्होनें पाँच माला का जप और बढाने का आदेश दिया।इक्कीसवें दिन जप करते हुए गोपालदास अर्धनिद्रित हो गए तभी भगवती धूमावती ने उनका हाथ पकड़ कर कहा,मेरे साथ मोटर में बैठकर चीन चलो।गोपालदास ने उत्तर में कहा कि,मैं अनुष्ठान कर रहा हूँ,अनुष्ठान छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ,कृपा करके आप अकेली चली जाएँ।माता धूमावती कार में बैठ गयी,मोटर चलने की आवाज आयी और वे अदृश्य हो गयी।यह बात श्री प्रभु से कही,तो उन्होनें कहा,तुमने गलती की तुम्हें माँ के साथ जाना था,खैर!अब हमको जाना पड़ेगा।उसके दूसरी रात्री को जपकर्ताओं ने जप करते समय अर्धोन्मीलित नेत्रों से देखा कि भगवती धूमामाई चीनी सेना पर प्रहार कर रही है,परिणाम स्वरूप चीनी सेना में भगदड़ सी मच रही है और वह अपने देश को वापस जा रही हैं।बाद में पूर्णाहुति से पूर्व ही चीन ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी।
इन्हीं दिनों देवरिया के एक एक वकील साहब ने श्री स्वामी की आज्ञा से सन् १९६२ ई. में भगवती धूमावती के लिए एक छोटा सा मंदिर निर्मित करा दिया,क्योंकि माता धूमावती ने श्रीस्वामी से कहा “मैंने तुम्हारा काम किया हैं अब तुम भी मेरा काम करो” मेरा भी आश्रम में एक मंदिर बनवाओं,तब श्रीस्वामी ने माता धूमावती की प्रतिष्ठा कराकर भक्तों के लिए उनके दर्शन सुलभ बना दिया।श्रीस्वामी जी की एक शिष्या श्रीमती रेणु शर्मा नागपुर से गुरूदेव से मिलने आई,आकर प्रणाम कर बैठी ही थी कि एक कृशकाय वृद्धा श्वेत वस्त्र पहने और ललाट तक ओढनी ओढकर वहाँ आई।उसने आते ही स्वामी जी से प्रसाद देने के लिए निवेदन किया,प्रभु ने उस वृद्धा को प्रसाद दिया।प्रसाद लेकर वह मुड़कर वापस जाने लगी।वह कुछ ही कदम चली होगी कि श्री मुख से निकला “भगवती धूमावती प्रतिदिन एक बार यहाँ से प्रसाद लेने आती हैं”।उसी समय रेणु शर्मा ने पूछा,हे सर्वसाक्षी!अभी आप कह रहे थे कि धूमावती माता प्रसाद लेने आती हैं,अगर उनके आने का समय आप बता दें तो मैं उस समय आकर उनका दर्शन करूँ।आपने कहा उनके आने का कोई समय नहीं है,तभी रेणुशर्मा के मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी कि यह बुढिया माता धूमावती तो नही थी और शीघ्रता से पलटकर पिछे की ओर देखा तो कोई भी नहीं था।रेणु शर्मा ने श्री स्वामी से पूछा कही यह बुढिया धूमावती माता तो नहीं थी,तो उन्होनें बहुत रहस्यमय वाणी में कहा ,हो सकता है,वो ही हो।
दतिया में नित्य कुछ समय के लिए भगवती धूमावती का दर्शन होता हैं,वैसे शनिवार को विशेष दर्शन होता है, भक्त लोग सफेद पुष्प के साथ नमकीन,मिक्चर के साथ,पुड़ी,पकौड़ा प्रसाद अर्पण कर माता की कृपा प्राप्त करते है।माता धूमावती विधवा रूप में है,इसलिये सौभाग्यवती स्त्री को दर्शन करने का निषेध हैं। महाविद्या में धूमावती का विशिष्ट महत्व है। जीवन में रोग,पीड़ा सभी को मर्माहत कर देता है। जीवन का शांत भाव से मनन किया जाय तो पता चलता है कि अंहकार,एवं मोह के कारण हम सत्य से दूर हो चूके है।”क्या चाहिए हमे”? शिव की उपासना करने से गुरू प्राप्त होते है तभी जीवन का रहस्य समझ में आता है। श्री करपात्री जी को मैसुर के राजा ने गंगा किनारे का अपना सैकड़ों एकड़ भूमि,महल के साथ दान कर दिया तब श्री करपात्री जी ने द्वारकापीठ के शंकराचार्य को बुलाकर उन्हें सारी संपति दे दी,यही संत,साधक का लक्षण है।श्रीसाई बाबा शिरडी वाले जीवन भर भक्तों के लिए सभी कुछ प्रदान किये,स्वयं के कुर्ता में पैंबद लगा रहा और उनका नाम बेचकर दुसरे ने अरबों कमा डाला।कौन सच्चा संत है यह तो हमे सोचना चाहिए।
गुरू गोरखनाथ,अवधूत दतात्रेय,श्रीस्वामी,श्रीरामकृष्ण परमहंस,श्रीसाईबाबा,स्वामी समर्थ,तैलंग स्वामी,वामाखेपा,अघोरी कीनाराम ,आचार्य श्रीरामशर्मा ये सभी परम संत,साधक,तथा स्वयं परमतत्व ही है।आज नकली साधक,संत से बाजार पटा है,सभी सिद्ध बनते है परन्तु ये किसी काम के नही है कारण माता धूमावती ने सभी को मोह से ग्रसित कर दिया है। साधक को ज्यादा समय मिलता ही कहाँ जो शिविर लगाए,दीक्षा दे,ज्यादा भीड़ जुटाने वाले का लक्ष्य एक ही है कि मेरे भक्त ज्यादा लोग हो जाए और धनार्जन हो।दशमहाविद्या ब्रह्मविद्या है और इसके अधिपति शिव हैं।बिना शिव कृपा किसी को महाविद्या की साधना फलीभूत नहीं होती।मेरा मन जब तक कृपण है,गणितीय बुद्धि है तब तक साधना के क्षेत्र में प्रगति संभव नहीं हैं।ऐसी कोई समस्या नहीं है,जो धूमावती माता दूर न करे। भूख लगी हो उस समय शरीर का क्या हाल होता है,इसे कोई भी समझता है। शिव ने लीला की और परम प्रेमी पुरूष शिव को ही उदरस्थ कर लिया यह जीव के प्रति शिव का प्रेम ही है, तभी तो करूणा से भरी उग्र शक्ति धूमावती को हम बार बार नमस्कार करते है।माता हम सच्चे मन से आपको पकौड़ा,पकवान का भोग देकर आपकी स्तुति कर रहे है,हमारे,संतान,परिवार के साथ ही हमारे राष्ट की भी रक्षा करे,तभी तो दतिया में आप विराजमान है।आपकी जय हो,जय हो,जय हो।श्रीस्वामी सहित माता धूमावती को बार बार नमस्कार हैं।
इसके बाद उस सुपारी को माँ धूमावती का रूप मानते हुए,अक्षत,काजल,भस्म,काली मिर्च और तेल के दीपक से और उबाली हुयी उडद और फल का नैवेद्य द्वारा
उनका पूजन करे, तत्पश्चात उस पात्र के दाहिने अर्थात अपने बायीं और एक मिटटी या लोहे का छोटा पात्र स्थापित कर उसमे सफ़ेद तिलों की ढेरी बनाकर उसके ऊपर एक दूसरी सुपारी स्थापित करे,और
निम्न ध्यान मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए माँ धूमावती के भैरव अघोर रूद्र का ध्यान करे –
त्रिपाद हस्त नयनं नीलांजनं चयोपमं,
शूलासि सूची हस्तं च घोर दंष्ट्राटट् हासिनम् ||
और उस सुपारी का पूजन,तिल,अक्षत,धूप-दीप तथा गुड़ से करे तथा काले तिल डालते हुए ‘ॐ अघोर रुद्राय नमः’ मंत्र का २१ बार उच्चारण करे | इसके बाद बाए
हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से निम्न मंत्र का ५ बार उच्चारण करते हुए पूरे शरीर पर छिडके –
धूमावती मुखं पातु धूं धूं स्वाहास्वरूपिणी |
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्यसुन्दरी ||
कल्याणी ह्रदयपातु हसरीं नाभि देशके |
सर्वांग पातु देवेशी निष्कला भगमालिना ||
सुपुण्यं कवचं दिव्यं यः पठेदभक्ति संयुतः |
सौभाग्यमयतं प्राप्य जाते देवितुरं ययौ ||
इसके बाद जिस थाली में माँ धूमावती की स्थापना की थी,उस सुपारी को अक्षत और काली मिर्च मिलकर निम्न मंत्र की आवृत्ति ११ बार कीजिये अर्थात क्रम से हर मंत्र ११-११ बार बोलते हुए अक्षत मिश्रित काली मिर्च डालते रहे |
ॐ भद्रकाल्यै नमः
ॐ महाकाल्यै नमः
ॐ डमरूवाद्यकारिणीदेव्यै नमः
ॐ स्फारितनयनादेव्यै नमः
ॐ कटंकितहासिन्यै नमः
ॐ धूमावत्यै नमः
ॐ जगतकर्त्री नमः
ॐ शूर्पहस्तायै नमः
इसके बाद निम्न मंत्र का जप रुद्राक्ष माला से २१,५१ , १२५ माला करें, यथासंभव एक बार में ही ये जप हो सके तो अतिउत्तम,अब मंत्र जाप प्रारंभ करे.
मंत्र:- ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट् ||
मंत्र जप के बाद मिटटी या लोहे के हवन कुंड में लकड़ी जलाकर १०८ बार घी व काली मिर्च के द्वारा आहुति डाल दें | आहुति के दौरान ही आपको आपके आस पास एक तीव्रता का अनुभव हो सकता है और पूर्णाहुति के साथ अचानक मानो सब कुछ शांत हो जाता है…
इसके बाद आप पुनः स्नान कर ही सोने के लिए जाए और दुसरे दिन सुबह आप सभी सामग्री को बाजोट पर बीछे वस्त्र के साथ ही विसर्जित कर दें और जप माला को कम से कम २४ घंटे नमक मिश्रित जल में डुबाकर रखे और फिर साफ़ जल से धोकर और उसका पूजन कर अन्य कार्यों में प्रयोग करें | इस प्रयोग को करने पर स्वयं ही अनुभव हो जाएगा की आपने किया क्या है,कैसे परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हो जाती है ये तो स्वयं अनुभव करने वाली
बात है….
देवी धूमावती को आज तक कोई योद्धा युद्ध में नहीं परास्त कर पाया, तभी देवी का कोई संगी नहीं हैं।